मूवी रिव्यू: 'अंडमान' ऐसी फिल्म जो कोरोना के संदेश के साथ व्यवस्था की पोल खोलती है



आपने IAS बनने के लिए तैयारी की है? आईएएस की तैयारी में जो ताने समाज, परिवार और रिश्तेदारों से मिलते हैं वह आप इस फिल्म की शुरूआत में देख पाएंगे। यह फिल्म एक ऐसे आदमी के बारे में है जो सिविल सर्विसेज की तैयारी कर रहा है मगर सिलेक्ट नहीं हुआ। इसके बाद वह एक पंचायत सचिव बन जाता है। दरअसल यह फिल्म भारतीय व्यवस्था की सच्चाई दिखाती है। यह एक छोटी सी फिल्म है जो प्रशासनिक लालफीताशाही, जातिवाद, ग्रामीण विकास की समस्या और सांप्रदायिकता को एक साथ समेटने की कोशिश करती है। शायद आज हमारे प्रशासन के हर अधिकारी को यह फिल्म देखनी चाहिए। अधिकारी इस फिल्म को इसलिए देखें क्योंकि आपको बेहतर हिंदुस्तान देखना है या नहीं? बस यह फिल्म इसी बारे में है।

रिव्यू: यह फिल्म हमारी व्यवस्था के लिए तीखा कटाक्ष है। यह फिल्म हमारी व्यवस्था की सारी पोल खोल रही है। आप कितने भी विकसित होने की बात करें लेकिन जाति व्यवस्था हमारे समाज को जकड़ी हुई है। कोई खास फर्क नहीं पड़ा है, जब दलित ग्राम प्रधान बोलता है- काम छोड़कर आए हैं, नहीं तो डांट खा जाएंगे। यह ग्रामीण भारत की सच्चाई है। एक पंचायत सचिव है जो आईएएस में सिलेक्ट नहीं हो पाया। बीच में कोरोना वायरस भी आ जाता है। उसके बाद लॉकडाउन लगता है। पंचायत सचिव के एक गांव में है और वहां बनता है क्वॉरेंटीन सेंटर मतलब वहां लोगों को रखना है। भावनाओं में बहकर मैं आपको पूरी कहानी नहीं बताऊंगा लेकिन फिल्म में देखने के लिए बहुत कुछ है। फिल्म में बहुत कुछ अच्छा है, जैसे पंचायत सचिव स्टैंड ले रहा है और उसमें दलित प्रधान को साथ लेता है। काश, हमारे सारे अधिकारी ऐसे ही होते। फिल्म देखते हुए आपको शायद कुछ वेब सीरीज ‘पंचायत’ की याद आ जाए। लेकिन मुद्दा हमारे गांवों की बेहतरी का है जो अब कुछ फिल्ममेकर उठा रहे हैं। हालांकि बहुत सी चीजें ऐसी हैं जो आपको अजीब लग सकती हैं जैसे लोअर मिडिल क्लास पंचायत सचिव आईफोन यूज कर रहा है।

वैसे एक बात कहने वाली है कि कोरोना वायरस और लॉकडाउन पर बनने वाली यह अच्छी फिल्म है। डायरेक्टर स्मिता सिंह ने कुछ मजाकिया सीन्स के साथ बहुत अच्छी फिल्म बनाई है। इसमें ‘वॉट्सऐप यूनिवर्सिटी’ पर भी तीखा कटाक्ष किया गया है मतलब सोशल मीडिया से दूर रहिए, वहां हर जानकरी सही नहीं है। सही बात जो जानने वाली है वो ये है कि अगर कोई आदमी अपनी ड्यूटी ठीक से करे तो उसे कोई नहीं रोक सकता। दहेज लिए एक अधिकारी का एक डायलॉग भी है- सॉरी सर, काल मार्क्स पढ़ा है, याद भी है, लेकिन ससुराल वाले जबरदस्ती रख गए। यानी समाज का दोहरा रवैया यहां आपको खुलकर देखने को मिलेगा। जातिवाद पर जो प्रहार इस फिल्म में किया गया है शायद कम ही फिल्मों में देखने को मिलता है। फिल्म में दिखाया गया है कि एक वक्त के बाद कैसे हर समाज कोरोना वायरस से डर जाता है। यह फिल्म कम से कम आज के माहौल में लोगों को जागरूक करने के लिए बहुत जरूरी है। फिल्म बीच में उपदेश देने वाली लगने लगती है कि केवल यह कोरोना का मेसेज दे रही है जबकि यह अच्छी तरह विकसित हो रही थी। फिल्म का सेकंड हाफ में पूरी तरह ट्रैक से उतर जाती है और आपको बोरियत होने लगती है। फिल्म की शुरूआत जितनी अच्छी है उसे उस हिसाब से विकसित नहीं किया गया है। स्मिता सिंह डेब्यूटेंट डायरेक्टर हैं और पत्रकार रह चुकी हैं, शायद इस फिल्म से वह बेहतर समझ विकसित कर पाएंगी। फिल्म छोटी होती तो बेहतर होता।

ऐक्टिंग: फिल्म को और जैसे बड़े ऐक्टर्स के नाम पर प्रमोट करने की कोशिश की गई है लेकिन ये इस फिल्म की यूएसपी नहीं हैं। फिल्म का हीरो समाज का रीयल हीरो है। फिल्म के ऐक्टर्स आपको अनजाने से लग सकते हैं लेकिन इनकी ऐक्टिंग काबिले तारीफ है। फिल्म के लीड ऐक्टर आनंद राज ने न केवल फिल्म में अभिमन्यु प्रताप के तौर पर पर पंचायत सचिव की मुख्य भूमिका निभाई है बल्कि फिल्म लिखी भी है। आनंद राज ने अच्छी ऐक्टिंग की है लेकिन ईमानदारी से कहा जाए फिल्म का सेकंड हाफ थोड़ा कमजोर है जो आपको बांधे रखने के काबिल नहीं है। सपोर्टिंग रोल में सभी ऐक्टर अपने हिस्से का काम अच्छी तरीके से करके गए हैं। बेहतर होता कि स्मिता सबकुछ एक ही फिल्म में समेटने के बजाय अलग-अलग फिल्में बनातीं, ज्यादा मजबूत बनतीं। हालांकि फिल्म का अंत बचकाना है लेकिन कोशिश यह भी बुरी नहीं थी।

क्यों देखें: ईमानदार कोशिश है जिसमें कई समस्याओं को एक साथ समेटने की कोशिश की गई है। थोड़ी कमजोर है लेकिन पॉजिटिव संदेश है तो देखना बनता है।

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