bhumika chawla sushant singh rajput tere naam: तो करीना कपूर की सुपरहिट फिल्म में होतीं भूमिका चावला, बोलीं- कुछ और ही होता मेरा करियर – actress bhumika chawla talks about her bollywood career upcoming films and sushant singh rajput


तेरे नाम‘ (Tere Naam) फेम अभिनेत्री भूमिका चावला (Bhumika Chawla) ने एक जमाने में बॉलिवुड में अपनी मासूमियत और खूबसूरती के बलबूते पर काफी सुर्खियां बटोरी थीं, मगर ‘दिल ने जिसे अपना कहा’, ‘रन’, ‘सिलसिले’, ‘फैमिली’, ‘गांधी’ जैसी हिंदी फिल्में करने वाली भूमिका का करियर बॉलिवुड में रफ्तार नहीं पकड़ पाया। साउथ में कई हिट फिल्में दे चुकी भूमिका इन दिनों चर्चा में हैं अपनी नई साउथ फिल्म ‘सीटीमार’ से। इस बातचीत में वह अपनी फिल्म, असफलता, सुशांत सिंह राजपूत (Sushant Singh Rajput) और औरत होने के पहलुओं पर दिल खोलकर बात करती हैं।

आपकी स्पोर्ट्स पर आधारित साउथ मूवी ‘सीटीमार’ को काफी पसंद किया जा रहा है? क्या आपका स्पोर्ट्स से जुड़ाव रहा है?
‘सीटीमार’ में मैं एक कबड्डी प्लेयर बनी हूं, जो अपने भाई को स्पोर्ट्स के लिए प्रेरित कर कोच बनाती है। मुझे एडवेंचर्स स्पोर्ट्स बहुत पसंद हैं। बैडमिंटन और स्विमिंग मैं एक अरसे से करती रही हूं। मगर मैंने स्कूबा डायविंग के लेवल वन का कोर्स भी किया हुआ है। मैं हुला हूप करती हूं। मनाली में हाल ही में मैंने रोप क्लाइमबिंग की थी। मैं हमेशा से स्पोर्ट्स पर्सन रही हूं। स्कूली दिनों में मैं बाइक चलाना सीख रही थी और बाइक राइडिंग के दौरान मेरा एक्सीडेंट हो गया था। तब मेरे पैर में गंभीर चोट आई थी और मैं पूरे ढाई महीने तक बिस्तर पर रही थी। मगर इसके बाद भी किसी स्पोर्ट्स को खेलने से मैं कभी पीछे नहीं रही। हाल ही में मैंने एक तेलुगु फिल्म ‘एडे मा कथा’ की है, जिसमें मैंने रॉयल एनफील्ड जैसी हेवी बाइक चलाई है।
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बाइक राइड करना महिला सशक्तिकरण का प्रतीक भी माना जाता है। आपने औरत होने के नाते खुद को सबसे ज्यादा इम्पावर्ड कब पाया?
मैं एक ऐसे परिवार में पैदा हुई, जहां हम तीन भाई-बहनों में दो बहनें और एक भाई थे। लेकिन मेरे माता-पिता ने घर पर लड़का -लड़की में कभी कोई भेद नहीं किया। यही वजह है कि मेरे लिए बाइक चलाना बड़ी बात नहीं है। मैं खुद को इम्पावर्ड तब महसूस करती हूं, जब मैं अपनी जिंदगी को संभाल सकूं। मेरे लिए महिला सशक्तिकरण वो है, जब आप आर्थिक, करियर, घरेलू या किसी भी सिचुएशन में डटे रहकर अपने मनमुताबिक निर्णय ले सकें। हालात के आगे डर कर झुकें नहीं। किसी भी बुरे हालात में अगर औरत अपने आपको मजबूत रखकर उसक सामना कर जाती है, तो उससे ज्यादा सशक्त कुछ हो ही नहीं सकता।
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क्या आपने एक महिला होने के नाते खुद को कमतर महसूस किया है?
हां, दो ऐसी सिचुएशंस जरूर रहती हैं, जब महिला होने के नाते मुझे बहुत हीनता महसूस होती है। जब भी क्राइम अगेंस्ट विमेन के केसेज होते हैं और वह चलते जाते हैं, सालों-साल कुछ वर्डिक्ट नहीं निकलता, तो बहुत बुरा लगता है। इसके अलावा अपराधियों को दी जाने वाली सजा उतनी कड़ी नहीं है कि मुजरिमों को डरा सके। दूसरी सिचुएशन वह होती है, जब औरतों को लेकर जोक्स और मीम्स बनते हैं और उन्हें खूब इंजॉय किया जाता है। ऐसे फॉरवर्डेड जोक्स काफी बेहूदा होते हैं। देखिए मेरा सेन्स ऑफ ह्यूमर बुरा नहीं है, मगर महिलाओं पर बनने वाले चुटकुले मुझे ह्युमिलिएट करते हैं।
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आपके करियर की बात करूं, तो सलमान खान के साथ ‘तेरे नाम’ जैसी सुपर हिट फिल्म देने के बाद आप नैशनल क्रश बन गई थीं, मगर उसके बाद बॉलिवुड में आपका करियर आगे नहीं बढ़ पाया?
आज जब सालों बाद मैं पलट कर देखती हूं, तो मुझे इसका सीधी-सी वजह लगती है, किस्मत! मगर इसकी गहराई में जाऊं, तो इसके कई कारण थे। पहली सिचुएशन तो ये थी कि आपके पास बड़ी-बड़ी फिल्में आईं, मगर उस दौरान मैं साउथ की फिल्में भी कर रही थी, तो मेरी डेट्स मैच नहीं हो पाईं। मुझे ‘जब वी मेट‘ (Jab We Met) और ‘मुन्ना भाई एमबीबीएस‘ (Munna Bhai MBBS) भी ऑफर हुईं थीं, मगर मैं वो फिल्में नहीं कर पाई। अगर मैंने वो फिल्में की होतीं, तो मेरा करियर कुछ और होता। तेलुगू में भी ऐसी दो फिल्में थीं, जो मैंने छोड़ दीं, क्योंकि मेरी शादी हो रही थी और मैं पहले से पांच फिल्मों में काम कर रही थी। तेलुगू की वे दो मूवीज भी ब्लॉकबॅस्टर साबित हुईं। फिर कई बार ऐसा भी होता है कि भूमिकाओं के जो प्रस्ताव आपको मिलते हैं, वे उतने सार्थक नहीं होते और आप खुद मना कर देते हैं। ऐसे हालत में गैप ज्यादा होता जाता है और वो फिर इतना बढ़ जाता है कि इंडस्ट्री वालों को लगता है कि आप काम करने के इच्छुक नहीं हैं, जबकि यह सच नहीं होता।
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मगर एक लंबे गैप के बाद आपने नीरज पांडे की ‘एमएस धोनी: द अनटोल्ड स्टोरी’ में धोनी (सुशांत सिंह राजपूत) की बहन का रोल करना स्वीकार क्यों किया?
सच कहूं, तो जब नीरज सर (निर्देशक नीरज पांडे) ने मुझे धोनी की बहन की भूमिका का प्रस्ताव दिया, तो मैं श्योर नहीं थी कि मुझे यह बहन का रोल करना चाहिए या नहीं? मगर फिर मैंने हां की, क्योंकि यह महान क्रिकेटर की बायॉपिक थी। असल में फिल्म में मेरा रोल छोटा था, मगर महत्वपूर्ण था कि देश के सबसे बड़े खिलाड़ी को खेल के लिए उसकी बहन प्रेरित करती है। वैसे जल्द ही मैं आपको एक बहुत ही अच्छी हिंदी फिल्म की न्यूज दूंगी। फिलहाल उस बारे में बात करने की मनाही है। मेरी आगामी फिल्म काफी रोचक होगी।

‘एमएस धोनी: द अनटोल्ड स्टोरी’ में आपने सुशांत सिंह राजपूत के साथ काम किया था। उनका असमय जाना और उसके बाद उनकी मौत के प्रकरण को लेकर जितने विवाद हुए, वे आपके लिए भी शॉकिंग रहे होंगे?
वह एक कमाल के साथी कलाकार थे। शूटिंग के दौरान हमारी काफी बातें हुई थीं। वह जिंदगी, अपने सपनों और रिलेशनशिप के बारे में बातें किया करते थे। वह बहुत ही मेहनती कलाकार थे। सेट पर उनकी तरफ से कभी कोई समस्या या उलझन नहीं हुई। बेशक शॉकिंग था सबकुछ। कुछ चैनल तो ओवर द टॉप चले गए। कई चैनल्स ने ने इसमें कई लोगों को इन्वॉल्व कर दिया। मुझे लगता है कि कोई भी खबर बायस्ड नहीं होनी चाहिए। बहुत सारे चैनल्स जनता को इन्फ्ल्युएंस कर रहे थे। दुर्भाग्यवश कुछ अरसे बाद यह एक प्राइम टाइम टीवी शो बन गया था, जिसे लोग खाते-खाते देखते कि चलो आज 9 बजे का शो चल रहा है। इसे देखेंगे, खाएंगे और सो जाएंगे। यह सबकुछ बहुत विचलित करनेवाला था। असल मुद्दे को छोड़कर बाकी सारी चीजें आ गईं, मगर रिजल्ट कुछ नहीं निकला।

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