pratik gandhi talking about bhavai: Pratik Gandhi talking about Bhavai Title Controversy scam 1992 his film career: प्रतीक गांधी: मेरे लिए अरेस्ट की मांग सुनकर मेरी मां, घर-परिवार वाले और पूरा गांव था परेशान


ऐक्टर प्रतीक गांधी (Pratik Gandhi) ने पिछले साल वेब सीरीज ‘स्कैम 1992’ (scam 1992 )गया। फिल्म में श्रीराम पर सवाल उठाने और रावण के महिमामंडन का आरोप लगाते हुए लोग विरोध करने लगे। फिल्म का टाइटल तक बदलना पड़ा। इन्हीं सब मुद्दों पर हमने प्रतीक से की खास बातचीत:

आपकी वेब सीरीज ‘स्कैम 1992’ को बेशुमार प्यार मिला। उसके बाद निजी और प्रोफेशनल स्तर पर जिंदगी कितनी बदली?
प्रफेशनली तो जिंदगी पूरी तरह बदल गई है। पूरे 180 डिग्री का बदलाव है। पहले मेहनत करनी होती थी कि हर जगह ढूंढ़ों कि कहीं कोई नई फिल्म बन रही है, तो कहीं कोई रोल मिल जाए। कहीं किसी ऑडिशन में हो जाए, पर अब मेकर्स की खुद बहुत इच्छा है मेरे साथ काम करने की। उन्होंने स्कैम में इतना बड़ा प्रॉजेक्ट देखा है, जो करीब पांच फिल्म के बराबर है, जहां बतौर ऐक्टर मुझे इमोशंस की पूरी रेंज दिखाने को मिली, ऑडियंस ने भी उसे इतना प्यार दिया, तो मेकर्स भी मेरे साथ फिल्म बनाना चाह रहे हैं। वहीं, निजी तौर पर ये बहुत संतुष्ट करने वाला फेज है कि इतने सालों से मैं अपने क्राफ्ट पर जो मेहनत कर रहा था, वह सही था। ये देखना कि लोगों को आपके काम से आनंद मिल रहा है, एक ऐक्टर के लिए बहुत बड़ी बात है।

स्कैम 1992 की तरह आपकी फिल्म भवाई भी खूब सुर्खियों में रही, पर यहां वजह अलग रही। फिल्म के ट्रेलर का जिस तरह का विरोध हुआ, टाइटल बदलना पड़ा, सीन हटाना पड़ा, वह कितना शॉकिंग था?
देखिए, भवाई स्कैम से पहले की फिल्म है। हमने इसे शूट भी पहले किया था। जब मैं भवाई शूट कर रहा था, तभी मुझे स्कैम के ऑडिशन के लिए कॉल आया था, तो भवाई मेरे लिए बहुत स्पेशल फिल्म है, क्योंकि ये मेरी पहली हिंदी फिल्म है, जिसमें मैं लीड रोल कर रहा हूं। ये किरदार बहुत मजेदार है, उसकी दुनिया बहुत चैलेंजिंग है, कहानी का सुर बहुत ही प्रासंगिक है। ये ऐसा विषय है, जिससे हम रोज अपने अंदर जूझते हैं कि सही क्या है, गलत क्या है। जहां तक फिल्म को लेकर विवाद की बात है, तो ये बहुत दिल दुखाने वाली बात है कि बिना फिल्म देखे, बिना उसे समझे, लोगों ने अपने दिमाग में इतना एजेंडा चला लिया, इतना हल्ला मचा दिया, लेकिन ये सोशल मीडिया का समय ही ऐसा है, जहां कोई भी कुछ भी बोल सकता है, तो इसका तो क्या ही कर सकते हैं। ये आशा जरूर है कि एक बार फिल्म देखने के बाद उनको ये पता चलेगा कि शायद उन्होंने दिमाग में जो कहानी बना ली है, वो गलत है। फिल्म दो ऐक्टर्स की लव स्टोरी है। इसमें जिस रावण की हम बात भी कर रहे हैं न, वह अपने अंदर का वो रावण है, हमारे आस पास चौबीसो घंटे है और वह है परसेप्शन यानी पूर्वाग्रह का रावण कि आप किसी चीज को बिना समझे एक छवि बना लेते हैं, उसी हिसाब से दुनिया को देखने लगते हैं और तब आप सही-गलत का भेद भूल जाते हैं।

स्कैम 1992 के बाद आपको हर तरफ सिर्फ प्यार ही मिल रहा था, पर भवाई के लिए अरेस्ट प्रतीक गांधी, बैन द फिल्म जैसे ट्रेंड सोशल मीडिया पर दिखे, इसे हैंडल करना आपके और आपके परिवार के लिए कितना मुश्किल था?

देखिए, मैं तो शिक्षकों के परिवार से हूं। मेरे परिवार में किसी ने आज तक ऐसा माहौल न तो देखा है, न उनको इसका अनुभव रहा है, तो ये जैसा रिएक्शन आया, उससे हम जैसे मिडिल क्लास फैमिली के लोगों को डर भी लग जाता है, तो मेरी माता जी, घर-परिवार वाले, गांव वाले सबको चिंता हुई कि ये क्या हुआ। उनको समझा पाना भी मुश्किल था, क्योंकि मुझे खुद पता नहीं कि ये क्यों हुआ, तो हां कभी प्रेशर हो जाता है, थोड़ी एंग्जाइटी भी होती है, पर इन लोगों ने ये भी सिखा दिया कि जिस फील्ड में मैं काम कर रहा हूं, शायद यह उसका हिस्सा है। मुझे इसके साथ जीना सीखना पड़ेगा, क्योंकि हमारे देश में इसके लिए कोई कानून नहीं है, न कोई नियम है, जिसके मन में जो आए, वो सोशल मीडिया पर कह सकता है। दुख तब होता है कि जब पढ़े-लिखे लोग इन चीजों को हवा देते हैं या मान लेते हैं। हम बस ये कह रहे हैं कि फिल्म देख लें, फिर रिएक्शन दें, क्योंकि हमारी फिल्म एक सीधी-साधी लव स्टोरी है, जिसमें न भगवान का कुछ लेना देना है, न रावण का कुछ लेना देना है।

क्या बतौर ऐक्टर आप पर इन चीजों का प्रभाव अगली फिल्म चुनते हुए भी पड़ेगा कि ऐसी फिल्म न करूं, जिसमें विवाद की गुंजाइश हो?
इसका जवाब मुझे नहीं पता, क्योंकि मैं क्या ही सोच लूंगा और कितना सोच लूंगा। मुझे नहीं पता कि किसको किस चीज से तकलीफ हो जाए। कब कौन किस चीज से आहत हो जाए। आप ये समझोगे कैसे? या तो उसका एक ही तरीका है कि जो स्क्रिप्ट हमारे पास आए, उसे पहले पब्लिक में पोस्ट कर दें कि भई ये स्क्रिप्ट हम कर रहे हैं, आपको दिक्कत है तो नहीं करेंगे। (हंसते हैं), अब यही पूछना बाकी रह गया है। और तो क्या ही करेंगे हम। वैसे हम ये भी करेंगे न, तो मुझे नहीं लगता कि किसी भी विषय पर कोई भी फिल्म बन पाएगी। लोगों को हर चीज में कुछ न कुछ दिक्कत लगेगी।

आपकी अगली फिल्मों डेढ़ बीघा जमीन और अतिथि भूतो भव: का क्या स्टेटस है?
अतिथि भूतो भव: मेरी और हार्दिक की दूसरी पिक्चर है, भवाई के बाद। ये फिल्म भी तैयार है, जल्द ही रिलीज डेट अनाउंस होगी। डेढ़ बीघा जमीन भी बहुत प्यारी फिल्म है, उसका शूट खत्म हो चुका है, जल्द ही वो भी तैयार हो जाएगी।

फिल्म पूर्वाग्रह और धार्मिक कट्टरता पर कटाक्ष करती है, जो हम अपने समाज में काफी देख रहे हैं। जैसे, पूर्वाग्रह के चलते भवाई का विरोध या करीना कपूर खान सीता कैसे बन सकती है, जैसे विरोध, कलाकार के तौर पर ये सब देखकर आपके मन में क्या भाव उठते हैं?
जितना मैं मेरे देश को समझता हूं, जितना मैं मेरे धर्म को जानता हूं, मैंने इतने सालों में ऐसा रिएक्शन अपने देश में नहीं देखा था। जब हम छोटे थे, तबसे अलग-अलग तरह की फिल्में बन रही हैं, अलग-अलग तरह के नाटक हमने देखे हैं। ये पिछले कुछ सालों से एक अलग रिएक्शन लोगों ने देना शुरू किया है। ऐसा लगता है कि कहीं कोई अपना पर्सनल एजेंडा चला रहा है। मुझे भी समझ में नहीं आता कि ये क्या है। जैसा आपने बताया कि ये आदमी ये रोल नहीं कर सकता, इसका तो क्या ही जवाब हो सकता है। ये आप कैसे तय करेंगे कि कौन क्या करे, क्या नहीं। ये कला है और हम कलाकारों का काम है अलग-अलग किरदार करना। आप रामायण की कहानी बताएंगे, तो किसी को तो रावण बनना पड़ेगा, कृष्ण की कहानी बताएंगे, तो किसी को तो कंस बनना पड़ेगा, इसका मतलब ये नहीं कि जो ऐक्टर रावण बन रहा है, वो सच में रावण है या जो ऐक्टर राम बना है, वो सच में राम जैसा है।

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